गुरुवार, 15 अगस्त 2019

स्वतंत्रता का मतलब स्वछन्दता तो कतई नही

आज की नकारात्मक विचारधारा कहां लेकर जाने वाली है!
स्वतंत्रता का मतलब स्वछन्दता तो कतई नही
चेतन सिंह खड़का
देहरादून। आप किसी भी जगह चले जाओ, एक बात कामन दिखाई देगी। नकारात्मकता तेजी से हमारे भीतर जगह बनाती जा रही है। यह भी अपने आप में सवाल है कि आज की नकारात्मक विचारधारा हमको कहां लेकर जाने वाली है। आज हम स्वतंत्रता का आनंद ले रहें है लेकिन यह नही भूलना चाहिये कि इसके लिए हमारे अग्रजों ने भारी कीमत चुकायी है। 
अपना सर्वस्व बलिदान करके उन्होंने हमारे सुनहरे भविष्य की नींव रखी थी। तब कहीं जाकर हमें आजादी का तोहफा मिला। लेकिन इसका अर्थ यह तो कतई नही कि स्वतंत्रता का मतलब स्वछन्दता निकाला जाये। आज विरोध को राजनीतिज्ञों ने नफरत में बदल दिया है। कुछ छद्म महत्वाकांक्षियों ने राजनीति को समाजसेवा कहना शुरू कर दिया है। हालांकि यह कंसेप्ट बुरा नही लेकिन उनकी मंशा खतरनाक है। 
 जो लोग सीधे रास्ते सत्तासीन नही हो पाये, अब वे प्रोपगंड़ा करके देश का माहौल खराब कर रहें है। अपनी महात्वाकांक्षा और कुंठाओं के चलते उन्होंने विरोध के लिए किसी भी हद तक जाने की ठान रखी है। भले ही दुश्मन देश की बोली बोलनी पड़े, उन्हें मंजूर है। अपने सपनों को ऐसे लोग एक खास वर्ग के समर्थन से पाता देख रहें है। हालांकि यह उनका महज एक वहम मात्र है। क्योंकि आज का हर भारतीय भले ही जाति-धर्म की बेड़ियों से जकड़ा हुआ हो, पर समझदार है कि कौन कितना उसका हितैषी है। 
यह भी सच है कि हमारा देश ही विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जहां तुष्टिकरण के चलते बहुसंख्यकों का उत्पीड़न होता है। इसके बावजूद अनेकता में एकता का ताना बाना टूटता नही। पहले तो केवल दुश्मन देश हमें तोड़ने या बिखेरने का प्रयास किया करते थे लेकिन अब उनको हमारे भीतर से समर्थन मिल जाता है। टुकड़ा टुकड़ा गैंग इसका बेहतर उदाहरण है। लेकिन राजनीति की ढाल में देशद्रोह की हरकत को शेल्टर मिल रहा है। 
यह कैसे मुमकिन है कि केवल और केवल राजनीतिक विरोध के लिए राजनीतिक दल इतना नीचे चला जाये कि उसकी हरकत से दुश्मन देश भी शर्माने लगे। यहीं कुछ देशभर में हो रहा है। राजनीतिज्ञ एवं तथाकथित बुद्विजीवी पहले तो नफरत की बोली बोल रहें है और जब उन्हें जवाब मिल रहा है तो हौंआ खड़ा किया जा रहा है कि लोकतंत्र खतरे में है। लेकिन ऐसे लोग एक्सपोज हो गए, क्या यह कम है?


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