शनिवार, 19 अक्तूबर 2019

क्या जस्टिस धुलिया बनेंगे चीफ जस्टिस!

समाचार विश्लेषणः ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर, सच को सच कहने की हिम्मत
लाख टके का सवाल- क्या जस्टिस धुलिया बनेंगे चीफ जस्टिस!



उपेक्षित वर्ग को सस्ता, सुलभ, शीघ्र न्याय दिलाने से भटकती लोक अदालतें 
कहीं नशा मुक्ति केन्द्रों की आड़ में सरकार को बदनाम करने की साजिश तो नही
जगमोहन सेठी
देहरादून। उत्तराखण्ड नैनीताल हाई कोर्ट के एक ईमानदार, साफ सुथरी छवि वाले न्यायमूर्ति नये साल की शुरूआत में मुख्य न्यायधीश की पदोन्नति पाकर सिक्कम में मुख्य न्यायधीश का कार्यभार सम्भाल सकते हैं लेकिन जस्टिस धूलिया की पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के सम्बन्धों को लेकर सवाल उठने स्वभाविक हैं।
हरीश रावत ने अपने कार्यकाल में जस्टिस धूलिया के भाई जो बोम्बे में फिल्म उद्योग से जुड़े हुए हैं को उत्तराखण्ड फिल्म विकास परिषद् का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था। आजकल खूब चर्चा का विषय बना हुआ है। डर लगता है कि कहीं जस्टिस धूलिया भी उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य न्यायधीश जोजफ की तरह पदोन्नति से पहले विवादों में न उलझ जायें।
गौरतलब है कि पूर्व चीफ जस्टिस जोजफ ने केन्द्र सरकार के मामले में कुछ विवादित फैसले दे दिये थे जिनको लेकर केन्द्र सरकार का विधि मंत्रालय नाराज था। इसके पीछे इलाहाबाद से आकर नैनीताल में वकालत कर रहे वकीलों की सियासत लगती है, जिनमें से कुछ हाईकोर्ट के न्यायधीश बन गये तो कुछ ने उनकी अदालत में वकालत करना ही लाभप्रद समझा। किन्ही कारणों से उनका आपस में कुछ बीच टकराव चल रहा है तो कुछ के बीच दोस्ताना सम्बन्ध है। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा को लेकर आये दिन विवादित चचाओं का बाजार गरम रहता है। इन अफवाओं को हवा दे रहा है जस्टिस धूलिया का एक पारिवारिक दोस्त सतीश शर्मा जो फिल्म उद्योग बम्बई में सक्रिय है तथा एक स्थानीय समाचार पत्र भी निकालता है।
यह एक कड़वा सच है कि सतीश शर्मा का सम्बन्ध बड़े बड़े लोगों से है जिन्हें वह अपने जाल में फंसाकर उनसे लेन देन के मामले में बिचौलिया की भूमिका अदा निभाता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत कर रहे सुधांशु धूलिया उत्तराखण्ड हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति बनकर आये। इसमें कोई दो राय नहीं उनके पिता इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस रहे हैं। नैनीताल हाईकोर्ट में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुधांशू धूलिया के द्वारा दिये गये न्यायिक फैसले चर्चित हैं। केन्द्रीय विधि मंत्रालय से छन कर आ रही खबरों पर यकीन करें तो जस्टिस धूलिया के बारे में आई0बी0 उत्तराखण्ड प्रभारी के कार्यालय से सत्यापन रिपोर्ट भेजी गयी है। उसे केन्द्रीय मंत्रालय अध्ययन कर रहा है। 
कहा जाता है कि रिपोर्ट में चाल, चलन, चरित्र के साथ ही साथ राजनीतिक विचारधारा के सम्बन्ध में भी जानकारी मांगी गयी थी। स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी में जस्टिस धूलिया के सत्यापन की कार्यवाही केन्द्र सरकार के विधि मंत्रालय को लौटा दी गयी है। वहीं उत्तराखण्ड नैनीताल के चीफ जस्टिस रमेश रंगनाथन ने भी जस्टिस धूलिया के पदोन्नति का अनुमोदन किया है। खुफिया विभाग से छन कर आ रही खबरों पर यकीन करें तो जस्टिस धूलिया का राजनीतिक सोच और विचारधारा के सम्बन्ध में खासतौर से जानकारी के बारे में पूछा गया है। कहा जाता है कि जस्टिस धूलिया इलाहाबाद में अपनी वकालत करने के दौरान उनका परिवार कांग्रेसी विचारधारा के करीब माना जाता था और गांधी परिवार के कानूनी सलाहकारों के बीच अपना एक अलग रूतबा रखते थे। 
जस्टिस धूलिया उस समय चर्चाओं में आये जब मुख्य न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन के मार्गदर्शन में आयोजित संकल्प देवभूमि नशा मुक्ति अभियान पर लोगों में बढ़ती नशे की आदत पर चिन्ता व्यक्त की, गोष्ठी में चीफ जस्टिस का कहना था कि उत्तराखण्ड राज्य नशे का एक अड्डा बनता जा रहा है। सरकार को नशे की रोक के लिये इस ओर खास ध्यान देना चाहिये। राज्य के 18 से 32 वर्ष के नौजवान किसी न किसी नशीली चीजो के आदि हैं यदि ऐसा रहा तो आने वाले वक्त में राज्य में हालात और बिगड़ेंगे। जो लोग नशा छोड़ना चाहते हैं उनके लिये राज्य सरकार को चाहिये कि प्रदेश में पुर्नावास के साथ साथ नशे के कारोबार में लगे लोगों के खिलाफ भी सख्त कार्यवाही की जाये। 
यह बात चीफ जस्टिस रंगनाथन ने संकल्प देवभूमि नशा मुक्ति अभियान के उद्धाटन समारोह में कही। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में वर्तमान में विभिन्न जिलों में चल रहे नशा मुक्ति केन्द्रों की हालत ठीक नहीं है। इन केन्द्रों में सुधार के नाम पर जिस तौर तरीकों से नशेड़ियों की आदत छुड़ाने के लिये आपत्ति जनक व्यवहार और अत्याचार किया जाता है उन्हें उचित नहीं ठहराया जा सकता। इन केन्द्रों की अन्दरूनी हालात भी खराब हैं। आये दिन कुछ न कुछ नये यातनाएं दिये जाने के किस्से सामने आते हैं। गौरतलब है कि राज्य में मुख्य न्यायमूर्ति विचारों के उलट राज्य सरकार चल रही है। 
यह कहने में संकोच नहीं है कि अब तक ऐसे कोई कदम नहीं उठाये गये है जिसके आधार पर सरकार ने लोगो में नशे की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए कोई प्रयास किया हो। इस वक्त राज्य में 18.8 प्रतिशत लोग शराब पीते हैं जबकि चीफ जस्टिस का कहना था कि नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून और उधमसिंह नगर में हालात खराब हैं। इसी मौके पर जस्टिस धूलिया ने नालसा की रिपोर्ट का जिर्क करते हुए उत्तराखण्ड के अधिकारियों जिनमें मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह, पुलिस महानिदेश अनिल रतूड़ी, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) यू0सी0 ध्यानी, सचिव गृह नितेश झा, राज्य के कानून व्यवस्था प्रभारी (डी0जी0) अशोक कुमार के साथ ही जिले के अधिकांश अधिकारी भी हाजिर थे।
यह कहने में कोई संकोच नहीं कि नशीले पदार्थों की राज्य की राजधानी देहरादून में धड़ल्ले से बिक्री हो रही है जिसका बुरा प्रभाव युवकों पर देखा जा सकता है। जब कभी मीडिया में यह चर्चा होती है तो पुलिस इन अड्डों पर छापेमारी करके अपने आप को साफ सुथरा साबित करने की कोशिश करती है। हाल ही में कुछ दिन पहले अवैध शराब की बिक्री के दौराने जहरीली शराब पीने से देहरादून में 7 व्यक्तियों की मौत हो गयी। लेकिन जांच में अभियुक्तों को बचाने के लिए कई कानूनी झोल छोड़ दिये गये। कितना अच्छा हो यदि इस प्रकरण की जांच उत्तराखण्ड के मुख्य न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन सी0बी0आई0 से कराने के लिए जनहित में आदेश दें। 
अवैध शराब बैचने का बेताज बादशाह अजय कुमार सोनकर उर्फ घोंचू था जो भाजपा का सक्रिय सदस्य था जिसे पार्टी से निकाल दिया गया है। पुलिस अपने पालनहार घोंचू के दरबार में माथा टेका करती थी। यह कहने में संकोच नहीं कि घोंचू पुलिस का पालनहार था और है। आजकल वह जेल में बन्द है लेकिन घर घर शराब सप्लाई करने के लिए उसको पुलिस संरक्षण प्राप्त था। दिनांक 27.09.2019 को प्रकाशित खबर ने कई सनसनीखेज खुलासे किये थे लेकिन शासन प्रशासन और सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। गली मौहल्ले और मलीन बस्तियों में घोंचू के अवैध निर्मित भवन में बार खुले हुए हैं। इसके बावजूद न तो एम0डी0डी0ए0 की कुम्भकरणी नींद टूटी और न ही अवैध निर्माण को लेकर एम0डी0डी0ए0 हरकत में आया। घोंच ने घर घर शराब पहुंचाने के लिए एक अनुमान के अनुसार उसने लगभग पचास से अधिक कागज-कूडा बिनने वाली महिलाओं को अपनी टीम में शामिल किया हुआ है। 
अफसोस तो यह है कि लोगों की मौत के बाद पलिस की कुम्भकरणी नींद टूटी तब तक घोचं को बचाने हेत कई सबत नष्ट किये जा चुके थे। शासन ने अपने आप को कड़क साबित करने के लिये घोंचू और उसके साथियों को गैंगस्टर एक्ट में जेल भेजना पड़ा जबकि अन्य धाराएं हल्की फुल्की लगायी गयी। जहरीली शराब पीने से हुए हत्याओं के मामलों को हल्का बना दिया गया। शायद इसीलिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के नेतृत्व में चलाये गये संकल्प देवभूमि नशा मुक्ति अभियान विवादित चचाओं का विषय बन गया। कई सवालों को जन्म देते हुए कहा गया कि सरकार की आबकारी नीति को ठेस पहुंची और आयोजन के पीछे मकसद कुछ और ही था। 
शासन द्वारा शराब की दुकानों को बन्द कराने के बाद वैध शराब के अधिकतर ठेकेदारों ने सरकारी राजस्व की हानि और सप्ताह भर दुकाने भर रखकर क्षतिपूर्ति की मांग की गयी। यह एक कडवा सच है कि शराब के ठेकेदारों के इस विरोध के पीछे सरकार का अपना ही खेल खेला गया। राज्य में एक्साईज विभाग मुख्यमंत्री के पास है। शराब प्रकरण को लेकर लोगों में भारी गुस्सा है। अन्दर ही अन्दर मुख्यमंत्री के विरोधी टांग खिचाई में लगे है। नतीजतन देश के ईमानदार कडक स्पष्ट राजनीतिक सोच वाले प्रधानमंत्री को उत्तराखण्ड के नेतृत्व के बारे में मुख्यमंत्री को प्रभावकारी दिशा निर्देश देने होंगे। 
गौरतलब है कि संकल्प देवभूमि नशा मुक्ति अभियान को लेकर कहीं जस्टिस धूलिया को एक कुशल, सक्षम न्यायमूर्ति प्रोजेक्ट करने का छुपा हुआ मकसद तो नहीं है। इससे पूर्व हाईकोर्ट द्वारा जितने भी आयोजन किये गये उनमें अक्सर न्याय चला निर्धन के द्वार, जन अदालते से जुडें मददे रहे हैं कि किन तौर तरीकों से दलित वर्ग के लोगों को सुलभ, शीघ्र और सस्ता न्याय उपलब्ध करवाया जा सकता है। जैसे संवेदनशील मुद्दों पर लोकअदालतों का आयोजन किया जाता है। गौरतलब है कि सतीश शर्मा के अलग अलग रंग देखने को मिलते है। कहीं वह अभिनेता बनाता है तो कहीं पे पत्रकार। मजे की बात यह है कि अधिकारी और समाज के धनाड्य लोगों के बीच देहरादून में उसके द्वारा ऐसा जाल बिछा रखा है कि एक बारे वह उसके जाल में फंस जाते है तो हजारों लाखों रूपये देकर जान छुड़ाते है। 
इसमें कोई शक नही कि देहरादून के उद्योगपति फारूख अहमद, सहारा कम्पनी के मालिकान में धवन सहित अधिकारियों में अशोक कुमार (डी0जी0) व संजीव चोपड़ा (निदेशक लाल बहादुर शास्त्री अकादमी) सहारनपुर का बहुचर्चित परिवार जैसे अधिकारियों के नाम को कैश करने का मौका नही चूकता। इसीलिए देहरादून के पत्रकार जगत में और आम लोगों के बीच उसकी इस हेरा फेरी की कलाकारी को लेकर उसको अलग अलग नामों से पुकारा जाता है। गलती से आप अपना रूतबा साबित करने के लिये उत्तरांचल प्रेस क्लब में चुनाव लड़े और पत्रकारों ने उसकी हैसियत को दिखाते हुए वह केवल तीन वोट ही ले पाया जिसमें एक अपना, एक अपने पिता को व एक अन्य किसी सदस्य का। 
उक्त सतीश लेने देने के मामले में इतना बदनाम हो चुका है कि उसे देहरादून छोड़ना पड़ा और फिल्म उद्योग में जाकर शुरूआत करनी पड़ी। अपने आप को फिल्म उद्योग में स्थापित करने के लिये फेस बुक पर महिलाओं और अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ फेस बुक पर अपने फोटो डालकर ये साबित करना चाह रहा है कि वह एक बहुत बड़ा कलाकार बन गया है जबकि अन्दरूनी हकीकत कुछ और है। देहरादून में देनदारी लेनदारी के चक्कर में कछ ऐसा फंसा हुआ है कि जब कभी देहरादून में आता है तो आने से पहले भूमिका बना देता है कि वह बाम्बे से आमुख अभिनेत्रियों या अभिनेताओं को लेकर आ रहा है। उनके ठहरने ठहराने के इन्तेजाम की जिम्मेदारी पैसे वालों पर डाली जाती है। 
डर लगता है जस्टिस सुधांशू धूलिया का पारिवारिक दोस्त की हरकते दोस्ती निभाने के चक्कर में उन पर भारी न पड़ जायें। 
सम्पर्क सूत्रः jagmohan_journalist@yahoo-com, jagmohanblitz@gmail.com 


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