गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

मनुस्मृति में क्या है!

 मनुस्मृति में क्या है!



मूल ग्रन्थ में शायद ऐसा न रहा हो जो आपत्तिजनक माना जाता है

शूरवीर रावत

देहरादून। चौबीस दिसम्बर को प्रतिवर्ष उत्तराखण्ड के गांधी नाम से विख्यात इन्द्रमणी बडोनी और पच्चीस दिसम्बर को पेशावर काण्ड के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्मदिवस पूरे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है। पच्चीस दिसम्बर को ही क्रिसमस की धूम-धाम पूरे विश्व में रहती है। पच्चीस दिसम्बर को ही सोशल मीडिया ‘व्हाट्सऐप’ पर ‘लोक का बाना’ ग्रुप से इन्द्रेश आईसा (इन्द्रेश मैखुरी) का लेख पढ़ा कि 1927 में पच्चीस दिसम्बर को ही भीमराव अम्बेडकर की नेतृत्व में ‘मनुस्मृति’ को जलाया गया। वामपंथी नेता इन्द्रेश मैखुरी जितने प्रखर वक्ता हैं उतने ही वे ऊर्जावान लेखक भी। वे लिखते हैं कि जातीय श्रेष्ठता के नकली बोध से ग्रसित हमारे समाज के लिये वह घटना एक बड़ी चुनौती थी। मनु स्मृति ही वो संहिता है जो हिन्दू समाज के श्रमशील हिस्से को अछूत मानकर उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को जायज ठहराने का आधार प्रदान करती है। महिलाओं के प्रति भी यह संहिता काफी क्रूर दृष्टिकोण लिये हुये है।

मनुस्मृति क्या है? हिन्दू धर्मशास्त्रों में मनुस्मृति एक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। सम्भवतः यह पहला संस्कृत ग्रन्थ है जिसका अनुवाद ब्रिटिश शासनकाल सन् 1794 में सर विलियम जान्स द्वारा किया गया। आज मनुस्मृति के पचास से अधिक हस्तलिखित ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु सबसे पहले प्रचलन में आया व सर्वाधिक बार अनुवादित हुआ संस्करण ही अठारहवीं सदी से प्रमाणिक माना जाता है। मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत हैं। परन्तु अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इस ग्रन्थ की रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी और ईसा की तीसरी शताब्दी के मध्य हुयी। ऐसा माना जाता है कि ‘मनु’ और ‘भृगु’ ऋषि के मध्य धर्म सम्बन्धी हुयी वार्ता इसका आधार है।

संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब (वेद नगर) बरेली से प्रकाशित एवं डा0 चमनलाल गौतम द्वारा सम्पादित ‘मनुस्मृति’ के 2004 संस्करण में सम्पादक/प्रकाशक ने दो शब्द शीर्षक में लिखा है कि यह ग्रन्थ निरा धर्मग्रन्थ ही नहीं है वरन विशेष रूप से नीतिगत भी है। आज भी इसकी मान्यता और उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि पुरातन युग में थी। हिन्दू धर्म सम्बन्धी विवादों में अब भी विधि ग्रन्थ के रूप में इसके प्रमाण न्यायालयों में मान्य किये जाते हैं। राजा के लिये आवश्यक है कि वह योग्य दण्डधर होकर न्यायपूर्वक राज्य का पालन करे। उसे देश, काल, शक्ति, विद्या और वित्त के अनुसार अपराधियों को दण्ड देना चाहिये। ‘राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता’ के अनुसार दण्ड ही राजा है, वही नेता, शासक और रक्षक है तथा ‘दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः’ पण्डितजन दण्ड को ही धर्म कहते हैं।

इस मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। जगदुत्पतिकथन, ब्रह्मोत्पति, स्त्री पुरुष की सृष्टि, मनु एवं मरीच्यादि की उत्पति, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र के कर्म, ब्राह्मण का श्रेष्ठत्व, धर्म के सामान्य लक्षण, धर्म की वेदमूलता, ब्रह्मवर्तदेशीय सदाचार, द्विजातियों का वैदिक मंत्र से गर्भाधानादि कर्तव्य, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, ब्रह्मचारी के कर्तव्य, गुरुकुल-वास के नियम, ब्रह्मचर्य विधि, असपिण्ड कन्या से विवाह, चारों वर्णों का भार्या-परिग्रह, विवाह के आठ प्रकार, ब्राह्मादि विवाह फल, सवर्णाविवाह विधि, युग्म तिथि में पुत्रोत्पति, कन्या विक्रय दोष, पिण्डदानादि विधि, तर्पण फल, ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य काल इन्द्रियार्थ आसक्ति निषेध, वय-कुल के अनुरूप आचरण, रजस्वला गमनादि निषेध, नग्न स्नानादि निषेध, रात्रि में तिल भोजन और नग्न शयन निषेध, शूद्र से व्रत कथनादि निषेध, आचार प्रशंसा, यम नियम श्रद्वा-दान का फल, असत्य कथन निन्दा, मृत्यु विषयक प्रश्न, वृथा मांसादि निषेध, आचमन विधि, स्त्री धर्म कथन, पर-पुरुष गमन निन्दा, वानप्रस्थाश्रम, अथितिचर्या, महाप्रस्थान, राजधर्म, प्रजारक्षण, न्यायवर्ती राजा की प्रंशसा, प्रजारक्षण, काम-क्रोधादि त्याग, सन्धि विग्रह काल, सैन्य प्रशिक्षण, उदासीन गुण, न्यायालय प्रवेश, असत्य कथन दोष, सीमा विवाद स्थल, स्त्री-पुरुष पशु आदि का हरण, दासों के सत्रह प्रकार, स्त्री रक्षा, व्यभिचार प्रायश्चित, कुपुत्र निन्दा, द्विजाति के श्रेष्ठ कर्म, परधर्म जीवन निन्दा, द्विज वर्ण कथन, राज्याधिकार, पंचमहापातक, प्रायश्चित, पापानुताप, निन्दा, तप, वेदाभ्यास, त्रिदण्डी परिचय, पाप से कुत्सिता गति, धर्मज्ञ लक्षण आदि अनेक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। ‘लोकानां तु निवृद्वयर्थं मुखबाहूरूपाधतः। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयेत्।।’ (31/अध्याय- एक) अर्थात लोकों की वृद्वि के लिये प्रभु ने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य एवं चरण से शूद्र उत्पन्न किये। ‘एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिषत्। एतेशामेव वर्णानां सुश्रुशामनसूयया।।’ (91/अध्याय- एक) अर्थात शूद्र के लिये प्रभु ने एक ही कर्म का आदेश दिया कि वह उक्त तीनों वर्णों की सेवा ईर्ष्या छोड़ कर करें।

‘स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्। अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः।।’ (213/अध्याय- दो) अर्थात स्त्रिायों का स्वभाव पुरुषों को दूषित करने वाला होने के कारण युवतियों के प्रति ज्ञानी पुरुष असावधान नहीं रहते।

‘शूद्रैव भार्या शूद्रस्य स च स्वा च विषः स्मृते। ते च स्वा चैव राजश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः।।’ (13/अध्याय- तीन) अर्थात शूद्र की भार्या शूद्र होती है, वैश्य अपनी सवर्णा और शूद्रा से, क्षत्रिय अपनी सवर्णा, वैश्य और शूद्रा से तथा ब्राह्मण चारों वर्ण की कन्याओं से विवाह कर सकता है। ‘वृषलीप्फेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च। तस्यां चैव प्रसूतस्य निष्दृतिर्न विधीयते।।’ (19/अध्याय- तीन) अर्थात शूद्रा के अधर का थूक चाटने वाला ब्राह्मण उसके साथ शयन करके उसके निःश्वास से अपने प्राणों को दूषित करता हुआ सन्तानोत्पादन करता है, उसके उद्वार का कोई प्रतिकार नहीं।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं इस मनुस्मृति में। अतः बाबा साहेब अम्बेडकर साहेब ही क्या एक सामान्य व्यक्ति को भी मनुस्मृति में वर्णित कुछ बातों पर आपत्ति होना स्वाभाविक है। परन्तु यह भी सम्भव है कि मूल ग्रन्थ में ऐसा कुछ न रहा हो जो आज आपत्तिजनक माना जाता है।


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