मंगलवार, 17 सितंबर 2019

ये काम करने वाले ही होते हैं बेटा कहलाने के अधिकारी

गरुड़ पुराण के अनुसार ये काम करने वाले ही होते हैं बेटा कहलाने के अधिकारी



पं0 चैतराम  भट्ट
देहरादून। पुत्र रूप में पैदा होने का मतलब यह नहीं कि अपने पिता के पुत्र हो गए। हिंदू धर्म में कर्म को प्रधानता दी गई है, इसलिए कहा गया है कि कर्म से ही मनुष्य पुत्र कहलाने का अधिकारी होता है। जो मनुष्य अपने पुत्र धर्म का पालन नहीं करता है उसे बेटा कहलाने का अधिकार नहीं है। गरुड़ पुराण के फलश्रुति अध्याय में बताया गया है कि पुत्र कहलाने का अधिकारी वही है जो पिता को मुक्ति दिलाने के कर्तव्य का पालन करता है। इसके लिए चार कर्म बताए गए हैं। इन चार कर्म को करने वाला ही पुत्र यानी बेटा कहलाने का अधिकारी माना जाता है।
धरती पर जो भी आया है उसे एक दिन अपने शरीर को छोड़कर जाना होता है। माता और पिता की मृत्यु के बाद पुत्र को गरुड़ पुराण का पाठ करवाना चाहिए। इस पुराण में भगवान विष्णु और गरुड़ के बीच हुए संवाद का उल्लेख है जिसमें जीवात्मा के मृत्यु के बाद की स्थिति का जिक्र किया गया है। मृत्यु के 12 वें दिन मृत व्यक्ति की आत्मा परिवार के बीच रहती है और जहां गरुड़ पुराण का पाठ होता है वहां बैठकर पाठ सुनती है, जिससे उनकी आत्मा मोह से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त करती है। इसलिए गरुड़ पुराण का पाठ करवाना चाहिए।
बिहार के बोध गया को गयासुर के पीठ पर विराजमान बताया गया है। गया भगवान विष्णु से वरदान प्राप्त है कि यहां श्राद्ध करने से आत्मा को सद्गति मिल जाएगी। आत्मा को स्वर्ग में स्थान प्राप्त होगा। भगवान राम ने भी पुत्र शोक में व्याकुल होकर प्राण त्याग कर चुके अपने पिता का यहां श्राद्ध किया था। कहते हैं यहां पर रेत के पिंड को ग्रहण करने पितरों की आत्मा प्रकट होती है और इसी पिंड से वह मुक्ति पा जाते हैं।
गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि मृत्यु को पाने के बाद आत्मा को यमलोक के मार्ग में वैतरणी नदी को पार करके जाना होता है। यह नदी बहुत ही भयानक है। इस नदी को पुण्यात्मा आसानी से पार कर जाते हैं। इस नदी को एक बैल की पूंछ पकड़कर मृत व्यक्ति की आत्मा पार करती है। जिनके पुत्र गाय से साथ बछड़े का दान करते हैं उनके माता-पिता सरलता से इस नदी को पार कर जाते हैं। इसलिए वृषोत्सर्ग करने का विधान है।
माता-पिता की मृत्यु होने पर पहले एक वर्ष तक माता-पिता के नाम से हर महीने मृत्यु तिथि पर मासिक श्राद्ध करना चाहिए। इसमें अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण को भोजन करवाना चाहिए। इससे आत्मा को यममार्ग में जाने का बल प्राप्त होता है और यममार्ग आसानी से पार कर जाते हैं। इसके बाद हर वर्ष पितृपक्ष के दौरान पितरों को तर्पण और श्राद्ध देना चाहिए।
यह धार्मिक रीति है इसमें आपको अपने सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार काम करना चाहिए। पुराण यह नहीं कहता कि इसके लिए आप अपना सबकुछ दांव पर लगा दें। पितरों के प्रति श्रद्धा भाव रखने मात्र से भी पितर प्रसन्न रहते हैं।


 


 


 


 


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