शनिवार, 25 जुलाई 2020

हाट कालिका माता का भव्य मन्दिर

हाट कालिका माता का भव्य मन्दिर
भक्तजनों के कष्टों का निवारण कर सुख और ऐश्वर्य प्रदान करती है हाट कालिका माता


- पवन रावत



शक्ति स्वरूपा महाकाली माता

गंगोलीहाट। दोस्तों, उत्तराखंड के चप्पे चप्पे पर देवी देवताओं का वास है इसीलिए इस खूबसूरत प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां सुदूर कोने कोने तक फैली गगनचुंबी चोटियों से लेकर मन को मोह लेने वाली शांत वादियों की सुंदरता के बीच अनेक मन्दिर स्थित हैं। देवभूमि में दिव्य धाम के तौर पर मौजूद मन्दिरों में देवी देवताओं की मौजूदगी श्रद्वालुओं द्वारा उनके पुण्य दर्शन के साथ महसूस की जाती है। 
पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में स्थित है हाट कालिका माता मन्दिर



हाट कालिका माता का भव्य मंदिर

पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में देवदार की छटाओं के बीच स्थित हाट कालिका माता मन्दिर समस्त श्रद्वालुओं के लिये विशेष आस्था का केंद्र है। प्रदेश भर से श्रद्वालु बड़ी ही आस्था और श्रद्वा के साथ महाकाली के दर्शन लाभ के लिये यहां पहुंचते हैं। शारदीय नवरात्रों में महाकाली के दर्शनों एवं विशेष पूजा अर्चना के लिये श्रद्वालु देश भर से बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। श्रद्वा और आस्था से सराबोर भक्तों पर माता की कृपा आशीर्वाद के रूप में बरसती है। देश के कोने कोने से माता के दर्शनों को पहुंचे श्रद्वालु यहां आयोजित होने वाले सहस्त्रा चंडी यज्ञ, शत चंडी महायज्ञ, सहस्त्रा घट पूजा एवं अन्य विशेष पूजन में शामिल होते हैं। स्कंद पुराण के मानस खंड में यहां का वर्णन विस्तार से मिलता है।
देवदार के घने जंगल के बीच स्थित महाकाली मन्दिर की शोभा देखते ही बनती है। प्रातःकाल सूरज की किरणें जब देवदार के घने जंगलों के बीच से गुजरती हुई मन्दिर को स्पर्श करती हैं तो ऐसा लगता है मानों वे महाकाली के चरण कमलों को छूकर उनकी वन्दना कर रही हों। शंख, घण्टी और नगाड़ों की गूंज के बीच सुबह की आरती के समय माता के दर्शन करने के लिये भक्तजनों का तांता लगा रहता है। शाम की आरती का दृश्य विशेष रूप से मनमोहक होता है। श्रद्वा एवं भक्ति के साथ महाकाली की आरती एवं मंत्रोच्चार से गुंजायमान मन्दिर परिसर के चारों तरफ श्रद्वालु एक पवित्रा और भक्तिमय वातावरण को महसूस करते हैं।
छठीं शताब्दी में आदि जगतगुरू शंकराचार्य ने किया था प्रतिष्ठापित
बताया जाता है कि छठीं शताब्दी में आदि जगतगुरु शंकराचार्य जब भारत भ्रमण के दौरान कुर्मांचल में जागेश्वर पहुंचे तो भगवान शिव की प्रेरणा से उन्हें यहां आने की इच्छा जाग्रत हुई। यहां पहुंचने पर उन्हें यहां नरबलि की परम्परा होने की जानकारी प्राप्त हुई जिससे उद्वेलित होकर उन्होंने इस दैवीय स्थल की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया एवं शक्ति के दर्शनों से भी विमुख हो गए। मान्यता है कि देवी शक्ति की माया के प्रभाववश शंकराचार्य को शक्ति के दर्शनों की इच्छा हुई। इस पर जैसे ही वे शक्ति स्थल के समीप पहुंचने लगे तो कुछ दूर पहले ही जड़वत हो गये और अचेत होकर गिर पड़े। 
चेतना प्राप्त होने पर उन्हें अपने अहंभाव पर अत्यधिक पश्चाताप हुआ जिसपर उन्होंने अन्तर्मन से माता से क्षमा याचना की जिस पर उन्हें मां भगवती की अलौकिक आभा का अहसास हुआ। महाकाली से वरदान स्वरूप प्राप्त मंत्र शक्ति एवं योग साधना के बल पर उन्होंने दैवीय शक्ति के दर्शन किये, उनके रौद्र रूप को शांत किया तत्पश्चात दैवीय शक्ति को कीलित करते हुए प्रतिष्ठापित किया। वर्तमान में अष्टदल एवं कमल से मढ़वायी गई इसी शक्ति की पूजा अर्चना यहां पर की जाती है।
जंगम बाबा द्वारा मन्दिर का निर्माण
भगवती महाकाली का दरबार अनेक चमत्कारों एवं किंवदंतियों से भरा हुआ है। मन्दिर निर्माण के बारे में बताया जाता है कि प्रयाग कुंभ में नागा पंथ के महात्मा जंगम बाबा को स्वप्न में इस शक्ति पीठ के दर्शन होते थे। जंगम बाबा यहां पहुंचे और मन्दिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ कराया। निर्माण कार्य के दौरान पत्थर की समस्या आन पड़ी। पिफर एक रात स्वप्न में उन्हें महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती रूपी तीन कन्याओं के दर्शन हुए जो उन्हें मन्दिर के नजदीक ही देवदार के वृक्षों के बीच पत्थर के खजाने तक ले गयीं। जैसे ही बाबा की नींद भंग हुई, बाबा सभी शिष्यों के साथ उसी समय चीड़ की मशालें बनाकर उस स्थान तक पहुंचे जहां खुदाई करने पर उन्हें बेहतरीन पत्थर प्राप्त हुए जिनसे मन्दिर, धर्मशाला, मन्दिर परिसर एवं मन्दिर प्रवेश द्वार का निर्माण किया गया।
भारतीय सेना के महत्वपूर्ण अंग कुमाऊं रेजिमेंट की आराध्य देवी



कुमाउं रेजीमेंट की ईष्ट देवी हाट कालिका माता



हाट कालिका माता का भारतीय फौज की महत्वपूर्ण शाखा कुमाऊं रेजिमेंट से भी गहरा नाता है। बताया जाता है कि द्वितीय विश्व युद्व के दौरान भारतीय सेना का एक जहाज बंगाल की खाड़ी में डूबने लगा। इस पर उसमें सवार सभी सैनिक अपने ईष्टदेव की आराधना करने लगे, जैसे ही कुमाऊं रेजिमेंट के सैनिकों ने हाट कालिका माता का जयकारा लगाया तो उनका जहाज किनारे लग गया। इस घटना के उपरान्त कुमाऊं रेजिमेन्ट ने हाट कालिका माता को उनकी आराध्य देवी की मान्यता के साथ स्वीकार कर लिया। तब से कुमाऊं रेजिमेंट के सैनिक हमेशा ही युद्व के समय हाट कालिका माता के दर्शन करके ही रवाना होते हैं। 
इसके पश्चात 1971 के युद्व मंे भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी और 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों ने भारतीय सेना के सम्मुख आत्म समर्पण किया, जिसे विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका जुड़ाव भी हाट कालिका माता से रहा है। युद्व की समाप्ति पर कुमाऊं रेजिमेंट द्वारा हाट कालिका मन्दिर में महाकाली की पहली मूर्ति चढ़ाई गयी। उसके उपरान्त वर्ष 1994 में कुमाऊं रेजिमेंट द्वारा अपनी आराध्य देवी की बड़ी मूर्ति चढ़ाई गयी।
महाकाली दरबार में सजती है राग आधारित शास्त्रीय होली की महफिल



शास्त्रीय होली प्रस्तुत करते होल्यार

कुमाऊं की होली देश भर में प्रसिद्व है फिर माता का दरबार इससे भला कैसे अछूता रह सकता है। होली के शुभ अवसर पर राग आधारित शास्त्रीय होली की महपिफल से सजता है महाकाली का भव्य दरबार।  
महाकाली मन्दिर कमेटी के उपाध्यक्ष शंकर सिंह रावल बताते हैं कि यह परम्परा पिछले तीस सालों से जारी है। प्रदेश के कोने कोने एवं अन्य स्थानों से शास्त्रीय संगीत के महारथी होल्यार महाकाली के दरबार में शास्त्रीय होली गायन प्रस्तुत करते हैं। महाकाली दरबार में शास्त्रीय रागों के रंगों की होली चढ़ाकर वे स्वयं को धन्य महसूस करते हैं एवं माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
ऐसे पहुंच सकते हैं माता के दरबार में



महाकाली दरबार में शास्त्रीय होली के दौरान लेखक, बांये



हाट कालिका माता के दर्शनों के लिये हल्द्वानी से अल्मोड़ा एवं पनार होते हुए लगभग 214 किमी की दूरी अथवा हल्द्वानी से अल्मोड़ा से सेराघाट राईआगर होते हुए लगभग 200 किमी की दूरी सड़क मार्ग से तय कर गंगोलीहाट पहुंच सकते हैं। हवाई सेवा सुचारू रहने पर पिथौरागढ़ तक गाजियाबाद एवं देहरादून से एक घण्टे में पहुंचा जा सकता है। यहां से सड़क मार्ग से 77 किमी दूरी पर गंगोलीहाट पहुंचकर माता के दर्शन किये जा सकते हैं।
तो भला अब देर किस बात की। अपनी श्रद्वा भक्ति और आस्था की त्रिवेणी के साथ महाकाली दरबार में हाजिरी लगाने के लिये तैयार हो जाइये और जयकारा लगाकर बोलिये.... जय जय जय महाकाली...
हाट कालिका माता की जय !!
(टीम पर्वतीय निशान्त)


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