रविवार, 27 दिसंबर 2020

सरकारों की आलाकमान पर निर्भरता का दंश झेलता प्रदेश

उत्तराखंड़ में सरकारें हमेशा आलाकमान के रहमोकरम पर बनती बिगड़ती रहीं

सरकारों की आलाकमान पर निर्भरता का दंश झेलता प्रदेश



प0नि0ब्यूरो

देहरादून। प्रदेश की हालिया सरकार के बारे में प्रचलित है कि यह सरकार पहले दिन से ही अनिश्चितताओं के झूले में झूलती रही। आज भी गाहे बगाहे सुनने को मिल जाता है कि मुख्यमंत्री बदल रहें है। शायद ही कोई महीना ऐसा जाता हो जबकि ऐसी अपफवाहें न उड़ती हों। कुछ ऐसा ही कमोबेस हर सरकार के बारे में बातें उड़ा करती थीं। विकास पुरूष नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज को भी अने पांच वर्ष पूरा करने के लिए क्या नहीं करना पड़ा। जबकि वे सबको साथ लेकर चलने में यकीन करने वालों में से थे। 

किस विरोधी से कैसे निपटना है, उनसे बेहतर कौन जानता होगा। उनके बाद चाहे कांग्रेस की सरकार बनी या भाजपा की, दोनों ही पार्टियों की सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही बदल दी गई। अब इसमें चाहे उनकी पार्टियों के आंतरिक मतभेद रहें हो या पिफर और कुछ लेकिन पूरे पांच साल तिवारी जी के बाद कोई नहीं कर पाया। अब वर्तमान सरकार पर भी ऐसे ही कयास और भविष्यवाणियां हो रहीं है। खासकर नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले के बाद तो जैसे तस्वीर ही बदल गई है।

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत प्रदान कर दी हो लेकिन इस पूरे मामले ने जनता की नजरों से अवश्य गिरा दिया है। ऐसा कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते है। वैसे भी प्रदेश के दो प्रमुख दल कांग्रेस- भाजपा के साथ सबसे बड़ी कमी यहीं रही है कि यह दोनों ही दल अपने अपने आलाकमान के फैसलों पर निर्भर रहते है। एक मंत्राी भी बनाना  हो तो कहा जाता है कि वह आलाकमान ही तय करते है। ऐसा लगता है जैसे आलाकमान पर निर्भरता का दंश प्रदेश की राजनीतिक स्थिरता का दुश्मन बनता जा रहा है। 

चूंकि मुख्यमंत्री चयनित होने की बजाय आलाकमान द्वारा मनोनित होता है इसलिए वह अपने नेतृत्व क्षमता पर निर्भर होने की बजाय अपने आलाकमान से करीबी होने की धैंस में टीम के साथियों को नाराज करता जाता है। टीम के सदस्यों की नाराजगी का मतलब हुआ पद से हटाया जाना। जैसा कि पूर्व में हरीश रावत सरकार के साथ हुआ। आलाकमान ने नहीं हटाया तो साथियों ने धूल चटा दी। भले ही इसके लिए बगावती पैतरें ही क्यों न चलने पड़े। हालांकि यहसरकार यदि अपने पांच साल पूरे करेंगी तो केवल इसलिए कि आलाकमान की यह इच्छा है।

हाल फिलहाल भी एक काबीना मंत्री के साथ जिस तरह से मनमुटाव हो रहा है और जिस तरह से उनके बीच आपस में तलवारें खींच रहीं है, यह अवश्य ही शुभ संकेत नहंी माने जा सकते। जो काम किया गया, उसे रजामंदी के साथ भी किया जा सकता था। कैसे? यही तो नेतृत्व क्षमता होती है, जो रास्ता निकाल ही लेती है। कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टुटे। लेकिन आलाकमान पर ऐंठने वालों को याद रखना चाहिये कि ज्यादा इतराना ठीक नहीं। आलाकमान जीतने वाले पर दांव लगाता है और हार-जीत जनता तय करती है। आपकी टीम के साथी तय करते है। आलाकमान नहीं।

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