बुधवार, 12 मई 2021

संस्मरणः सदियों पुरानी सांस्कृतिक परम्परा है ‘गाडूघड़ा’

 संस्मरणः सदियों पुरानी सांस्कृतिक परम्परा है ‘गाडूघड़ा’



शूरवीर रावत

देहरादून। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा श्रीबद्रीनाथ मन्दिर के उद्वार के बाद मन्दिर की सुरक्षा एवं व्यवस्था का दायित्व स्थानीय शासक ने ले लिया। नौंवी शताब्दी के मध्य में चांदपुर गढ़ी में गढ़वाल राज्य के संस्थापक कनकपाल के आगमन के बाद पूर्ववर्ती राजाओं की भांति श्रीबद्रीनाथ मन्दिर उनके परिक्षेत्र में होने के कारण वहां की व्यवस्था वे देखने लगे। राजा कनकपाल ही नहीं उनके वंशज राजाओं के लिये श्रीबद्रीनाथ मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि श्रीबद्रीनाथ उनके ईष्ट रहे है। संभवतः इसीलिये श्रीबद्रीनाथ के ध्वज पर अंकित चिन्ह ‘गरुड़’ गढ़राज्य शासक के ध्वज पर भी है। श्रीबद्रीनाथ गढ़वाल राजा के ईष्ट होने के कारण मन्दिर के लिये पूजा-हवन से सम्बन्धित सामग्री राजदरबार से ही जाती रही है। राजा उसके अर्चक रहे हैं अर्थात पहली संविदा उनकी ओर से जाने की परम्परा रही है।

पीढ़ियां बदली, समय-समय पर राजधानी भी बदली परन्तु श्रीबद्रीनाथ के प्रति आस्था में कोई दरकन नहीं आयी। आज जब इस राजवंश की 60वीं पीढ़ी के महाराजा जीवित हैं तब भी परम्परा का निर्वहन पूर्ववत हो रहा है। बस, अन्तर इतना आया है कि गढ़राज्य की राजधानी चांदपुर गढ़ी बद्रीनाथ के निकट होने के कारण पहले पूजा-अर्चना व हवन की सम्पूर्ण सामग्री राजा की ओर से जाती रही है। समय बदला, आवागमन के साधन बढ़ने के साथ-साथ भक्तों की संख्या भी बढ़ी जिससे जगह-जगह बाजार बन गये। पूजा व हवन सामग्री की व्यवस्था मन्दिर के पुजारियों द्वारा स्वयं ही की जाने लगी किन्तु मन्दिर में श्रीबद्रीनाथ के अभिषेक के लिये दिये का पूरा तेल आज भी राजा की ओर से ही दिया जाता है। 

परम्परानुसार गढ़वाल (अब टिहरी) राजा के ईष्ट होने व श्रीबद्रीनाथ के प्रति उनकी अगाध निष्ठा के कारण आज भी श्रीबद्रीनाथ मन्दिर के कपाट खुलने व बन्द होने की तिथि गणना राजा की उपस्थिति में राजदरबार के ज्योतिषियों द्वारा की जाती है और तदानुसार ‘गाड़ूघड़ा’ (अभिषेक के लिये तिलों के तेल निकालने का कलश) व भेजने  का दिन तय होता है। कुछ परम्परायें तो हमारी सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न अंग है। राजपरिवार से जुड़ी गाड़ूघड़ा भी एक ऐसी ही परम्परा है। श्रीबद्रीनाथ के प्रति गढ़राज्य के राजा की आस्था व समर्पण की भावना देखकर ही भगवान बद्री ने उन्हें कुछ दैविक शक्तियां प्रदान की है, ऐसा माना जाता है। कुछ लोग तो उन्हें श्रीबद्रीनाथ का अंश बोलान्दा बदरी अर्थात जीवित बद्रीनाथ ही मानते रहे हैं। 

गढ़वाल राजा का न्याय प्रिय होना, राज्य में अतिवृष्टि, बाढ़, सूखा व दुर्भिक्ष आदि प्राकृतिक आपदाओं का नगण्य होना दैव कृपा ही मानी जाती है। यह भी ईश्वर का वरदान ही तो है कि निरन्तर साढ़े ग्यारह सौ (1150) वर्षों से अधिक समय तक तक गढ़राज्य पर एक परिवार का शासन रहा है। राजा कनकपाल (सन् 848ई0) से राजा मनुजेन्द्र शाह (वर्तमान) तक। टिहरी रियासत स्वतंत्र भारत में विलय होने के बाद भी बदरी विशाल की ही कृपा है शायद कि राजपरिवार के सदस्य ग्यारह बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं।

‘गाडूघड़ा’ की इस सांस्कृतिक परम्परा को देखने की ललक कई वर्षों से थी। परन्तु हर बार कुछ न कुछ अड़चन आ जाती। इस बार ठान लिया था कि जाना है तो जाना है और 25 अप्रैल को मित्रों सहित नरेन्द्रनगर का रुख कर लिया। सन् 1925 में महाराजा नरेन्द्रशाह द्वारा टिहरी रियासत की राजधानी टिहरी से हटाकर नरेन्द्रनगर में बसायी गयी। कुंजापुरी पहाड़ी के दक्षिणी ढलान पर बसा नरेन्द्रनगर ऋषिकेश से मात्र 17 किलोमीटर दूरी पर लगभग 1000 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। राजशाही समाप्त होने (1948) के बाद भी उपयुक्त जलवायु, मुख्यालय हेतु पर्याप्त स्थान तथा रेलहेड से निकटतम होने के कारण नरेन्द्रनगर को ही टिहरी जनपद का मुख्यालय बनाया गया। इस प्रकार लगभग 110 वर्षों तक टिहरी रियासत की राजधानी रही।

टिहरी नगर से जिला मुख्यालय होने का गौरव छिन गया। किन्तु नरेन्द्रनगर भी लम्बे समय तक जिला मुख्यालय न रह सका क्योंकि टिहरी बांध के उपरान्त टिहरी नगर व जिला मुख्यालय को एक ही स्थान पर नई टिहरी में स्थानान्तरित कर दिया गया। यह दीगर बात है कि पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र व अन्य कुछ कार्यालय आज भी नरेन्द्रनगर में ही चल रहे हैं।

नरेन्द्रनगर पहुंचकर राजमहल में बाईपास रोड (उत्तर) की ओर की सीढ़ियां चढकर गेट खोलना चाहा तो वह अन्दर से बन्द था। पिछवाड़े की ओर गये तो उधर तैनात गेटकीपर ने रोक दिया कि ‘आगे के गेट से जाओ!’ फिर घूमकर आगे के गेट पर आये तो वह फिर बन्द ही मिला। फिर पत्रकार मित्र शीशपाल गुसाईं को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह स्वयं इस वक्त देहरादून में है। उनसे महल में तैनात केयर टेकर को फोन करवाया गया तो तब जाकर कहीं गेट खुला।

भीतर महारानी माला राज्य लक्ष्मी शाह, जो कि वर्तमान में टिहरी लोकसभा से सांसद हैं, पीले साड़ी-ब्लाउज पहने तिल कूटने में रत दो दर्जन से अधिक महिलाओं के समीप ही बैठी थी। सभी ने मुंहपर भी पीला कपड़ा बांधा हुआ था। महारानी भी स्वयं पीले वस्त्रों में ही सुसज्जित थी। गाड़ूघड़ा का दिन ज्योतिषियों के अनुसार बैसाख माह में कृष्ण पक्ष की पंचमी को निर्धारित होता है। महारानी स्वयं इस परम्परा का शुभारम्भ करती है। तिल कूटने वाली महिलायें आस-पास के गांवों की थी। माना जाता है कि इस दिन प्रायः केवल वे महिलायें ही गाड़ूघड़ा में शामिल होती है जिनका सम्बन्ध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर राजपरिवार से होता है। इसमें सम्मिलित होने वाली महिला प्रातः उठकर स्नान कर व्रत रखती है और पीले वस्त्र धारण कर तिल कूटने के लिये राजमहल में आती है। 

सवा मन (लगभग पचास किलो) तिल चक्की में पीस कर कुछ ही क्षणों में निपटाया जा सकता है। परन्तु पीत वस्त्रधारी अनेक महिलाओं द्वारा जब सामुहिक रूप से तिल भूनकर और फिर ठेठ पहाड़ी अन्दाज में उसे ओखली में बांज की मूसल से कूटा जाता है तो वातावरण में घम्म-घम्म, स्यप्प-स्यप्प की आवाज प्रतिध्वनित होती है तो मन रोमांचित हुये बिना नहीं रहता। इसे देखकर उन दिनों की याद आ गयी जब गांव में किसी की शादी में अणसों के लिये ताक (चावल का पीठो) गांव की ही कुछ औरतें सामुहिक रूप से हल्ला-ठठ्टा करते हुये कूटती थी। परन्तु यहां श्रीबद्रीनाथ के प्रति अगाध आस्था और पवित्रता को ध्यान में रखते हुये तिल कूटते समय मुंह व सिर पर कपड़ा बांधना आवश्यक होता है। तिलों को भूनकर व कूटकर उससे तेल निकालना काफी श्रमसाध्य कार्य है परन्तु वहां पर उपस्थित महिलायें इसे प्रसन्नचित होकर सम्पन्न कर रही थी।

महारानी से दूरी बनाये हुये उनके बायीं ओर नरेन्द्रनगर के निकटस्थ गांव कुमारखेड़ा के आवजी सुमनदास तथा ढोल व नगाड़े पर थाप देने वाले बचनदास निरन्तर ढोल दमाउं बजाकर इस परम्परा को पूरा सम्मान दे रहे थे। वहीं कुछ अन्य लोगों के साथ महारानी के पास जौनपुर ब्लाक की पूर्व प्रमुख श्रीमती गीता रावत भी अपने पति सहित उपस्थित थी। शायद उन्हंे भी गाड़ूघड़ा की जिज्ञासा खींच लाई थी। महाराजा मनुजेन्द्र शाह नरेन्द्रनगर महल में मौजूद थे परन्तु हमारे वहां पर रहते तक वे कार्यक्रम स्थल पर नहीं आ पाये थे। कुछ बातें महारानी के साथ करके और जानकारी ली। 

उम्मीद थी कि इस अवसर पर महारानी द्वारा उपस्थित सभी दर्शनार्थियों को भोजन करवाया जायेगा। परन्तु दुःख हुआ कि वहां पर खाना तो दूर की बात चाय तक लिये भी नहीं पूछा गया। तिलों के तेल के कलश अर्थात गाड़ूघड़ा लेने श्रीबद्रीनाथ से वहां मन्दिर में पूजा करने वाले डिमरी पंचायत के लोग आये हुये थे। वही लोग फूलमालाओं से सजी हुयी गाड़ी में कलश रखकर श्रद्वा और सम्मान के साथ इसे बद्रीनाथ पहुंचाकर डिमरी महापंचायत को सौंपते हैं। कलश वाली गाड़ी जहां-जहां गुजरती है वहीं श्रद्वालु हाथ जोड़कर बद्री विशाल के जय-जयकारे करते हैं। श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर, कर्णप्रयाग, मैठाणा, नन्दप्रयाग, पीपलकोटी आदि प्रत्येक पड़ाव पर कलश के दर्शन के लिये जनता उमड़ पड़ती है व कलश का भव्य स्वागत होता है। यह भगवान बद्रीनाथ के प्रति उनकी आस्था तो है ही अपितु अपने राजा के प्रति सम्मान भी दर्शाता है।

उत्तराखण्ड हिमालय की इस भव्य व सदियों पुरानी समृद्व परम्परा का प्रत्यक्षदर्शी होना ही हमारे लिये गौरव की बात है। (अप्रैल 27, 2016)


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