शनिवार, 28 अगस्त 2021

अफगानियों को शरण देने में जल्दबाजी करना सही नहीं

भारत को यूरोपियन देशों और रूस के अनुभव से सबक लेना चाहिये
अफगानियों को शरण देने में जल्दबाजी करना सही नहीं


प0नि0ब्यूरो
देहरादून। हमारे पडोसी देश अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद काबुल एयरपोर्ट में स्थानीय नागरिकांे में देश छोड़कर जाने की होड़ लग गई है। वहां के नागरिक तालिबान के इस्लामिक शरिया कानून से डरे हुए है, ऐसा जताया जा रहा है। बहुत से मामले में यह सच भी है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। क्योंकि जैसा कहा जा रहा है या दिख रहा है, हकीकत उसके उलट है।   
यह बात रूस के द्वारा अफगानियों को शरण न देने के फैसले से भी झलकता है। कहा जा रहा है कि अफागनी नागरिक तालिबान से प्रताड़ित है। मासूम है। लेकिन विचार करने योग्य बात है कि कुछ अपवादों को छोड़ भी दिया जाये तो धरातल पर जो तालिबानी प्रभुत्व दिख रहा है, वह बिना लोकल स्पोर्ट के संभव नहीं हो सकता है। फिर जिस तेजी से तालिबान ने अफगानिस्तान की धरती पर अपना परचम फहराया, वह एक दो दिनों की कवायद नहीं है। यह काफी समय पूर्व से हो रहा था। यानि लोग तालिबान की पराधीनता को स्वीकार रहें थे। और जब अमेरिकी सेना ने थोड़ा सा स्पेस दिया, तालिबानी बाहर निकल आये।
इसका मतलब यह कि जो दिखाई दे रहा है, वह सही नहीं है। बल्कि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जिस पर अधिकांश लोगों की नजर नहीं जा रही और हम दयालू बनकर अफागनियों को शरण देने को मरे जा रहें है। जबकि ऐसा करने में जल्दबाजी करना सही नहीं है। रूस ने अफगान नागरिकों को यह कहकर शरण देने से मना कर दिया है कि वह ऐसा करके अपने नागरिकों की सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल सकता है। 
खाड़ी देशों में चल रहें युद्व के बाद सीरिया और इराक जैसे देशों से आ रहें शरणार्थियों को अपने देश में प्रश्रय देकर यूरोपियन देशों ने बड़ी कीमत चुकाई है। क्योंकि वहां शरणार्थियों ने उनकी जिन्दगी में दखल देनी शुरू कर दी है और लगातार शरणार्थी स्थानीय नागरिकों को परेशान कर रहें है। कई देशों में तो यह शरणार्थी आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहें है। इसके प्रफांस और अमेरिका उदाहरण है। इसलिए मानवता की दुहाई देने के साथ-साथ आंख कान खुले रखने होंगे। वरना अफगानी आतंक हमारे देश में कब इंटर कर जायेगा, पता भी नहीं चलेगा। 
रूस और उसके सहोदर देश मसलन तजाकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे मुल्क अफगानी लोगों को शरण नहीं दे रहें है तो इसलिए नहीं कि वे मानवतावादी नहीं है। बल्कि इसलिए कि वहां की सरकारें आपे देश के नागरिकों की सुरक्षा को सुनिश्चित कर लेना चाहती है। इसके लिए वह कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहती। पिफर यूरोपियन देश जिस तरह से शरणार्थियों के कारण परेशानी झेल रही है, वो भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 
भारत सरकार को अफगान लोगों को अपने यहां शरण देते समय इस बात का ख्याल रखना होगा कि वह जल्दबाजी न करे। ऐसा न हो कि गलत लोगों को अपने यहां प्रवेश दे दिया जाये जिसकी वजह से आगे चलकर परेशानी खड़ी हो सकती है। मानवता वहीं तक ठीक, यहां तक कि हमारे नागरिकों को नुकसान न पहुंचे। लेकिन इसकी एक पर्सेंट भी संभावना हो तो शरण देने से सरकार को बचना चाहिये। क्योंकि अपने नागरिकों एवं राष्ट्र की सुरक्षा को दांव पर लगाकर कर मानवीयता नहीं निभाई जा सकती।

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